शुचिपर्यावरणम् आधुनिक संस्कृत कवि हरिदत्त शर्मा की कविता है, जो लसल्लतिका संग्रह से ली गई है। इस कविता में कवि ने मशीनों, वाहनों और प्रदूषण से भरे शहरी जीवन के दुष्प्रभावों को उजागर किया है। इसके विपरीत नदियाँ, जलधाराएँ, हरियाली, पक्षियों का कलरव और वन प्रकृति की शांति तथा सुंदरता का अनुभव कराते हैं। कवि चेतावनी देता है कि पत्थरों और मशीनों पर आधारित सभ्यता के विकास में लताओं, वृक्षों और झाड़ियों को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए। कविता का मुख्य संदेश है कि विकास ऐसा होना चाहिए जो प्राकृतिक पर्यावरण को सुरक्षित रखे, क्योंकि स्वच्छ पर्यावरण मानव जीवन के स्वास्थ्य, सुख और कल्याण के लिए आवश्यक है।