सौहार्दं प्रकृतेः शोभा एक संस्कृत नाट्यांश है, जो पारस्परिक सद्भाव और सहयोग का महत्त्व समझाता है। नाटक में वन के पशु-पक्षियों के बीच वनराज बनने को लेकर विवाद उत्पन्न हो जाता है। सिंह, वानर, काक, कोकिल, गज, बक, मयूर, व्याघ्र और चित्रक आदि अपने-अपने गुणों का वर्णन करते हुए स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करते हैं तथा एक-दूसरे की कमियाँ बताते हैं। इस प्रकार अहंकार और स्वार्थ के कारण वन में कलह उत्पन्न होती है। अंत में प्रकृतिमाता वहाँ आकर सभी को समझाती हैं कि प्रत्येक जीव का अपना महत्त्व है और सभी प्रकृति के अभिन्न अंग हैं। कोई भी प्राणी अकेले सम्पूर्ण व्यवस्था नहीं चला सकता; सभी एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इसलिए उन्हें परस्पर ईर्ष्या और विवाद छोड़कर प्रेम, मैत्री तथा सहयोग से रहना चाहिए। पाठ का केंद्रीय संदेश है कि सौहार्द, सह-अस्तित्व और पारस्परिक सहयोग ही प्रकृति तथा समाज की वास्तविक शोभा हैं।