बुद्धिर्बलवती सदा पाठ शुकसप्ततिः नामक प्रसिद्ध कथाग्रन्थ से संपादित किया गया है। कथा में देउल नामक गाँव के राजपुत्र राजसिंह की पत्नी बुद्धिमती अपने दोनों पुत्रों के साथ पिता के घर जा रही होती है। मार्ग में घने जंगल में उसे एक व्याघ्र दिखाई देता है। बुद्धिमती घबराने के बजाय अपने पुत्रों को डाँटने का अभिनय करती है और ऐसा कहती है मानो वे व्याघ्र को खाने के लिए आपस में झगड़ रहे हों। उसकी बात सुनकर व्याघ्र उसे व्याघ्रमारिणी समझकर भयभीत होकर भाग जाता है। रास्ते में एक धूर्त शृगाल व्याघ्र को फिर से बुद्धिमती के पास ले जाने के लिए उकसाता है और उसके गले में बँधकर साथ चलता है। बुद्धिमती दोबारा अपनी बुद्धि और वाक्चातुर्य से शृगाल पर व्याघ्रों को लाने का आरोप लगाती है। इससे व्याघ्र फिर डरकर भाग जाता है और बुद्धिमती अपने दोनों पुत्रों सहित सुरक्षित बच जाती है। कथा का मुख्य संदेश है कि बुद्धि, धैर्य और प्रत्युत्पन्नमति से बड़े संकटों का भी सामना किया जा सकता है।