जननी तुल्यवत्सला पाठ महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के वनपर्व से उद्धृत है। कथा में एक किसान दो बैलों से खेत जोत रहा होता है। उनमें से एक बैल दुर्बल होने के कारण हल खींचने और तेजी से चलने में असमर्थ हो जाता है। किसान उसे बार-बार कष्ट देकर उठाने का प्रयास करता है। अपने दुर्बल पुत्र की यह दयनीय स्थिति देखकर गौमाता सुरभि की आँखों से आँसू बहने लगते हैं। देवराज इन्द्र उसके दुःख का कारण पूछते हैं। सुरभि बताती है कि यद्यपि उसके हजारों पुत्र हैं और वह सभी से स्नेह करती है, फिर भी दुर्बल तथा पीड़ित पुत्र के प्रति उसकी करुणा अधिक है। सुरभि के मातृ-वात्सल्य को समझकर इन्द्र का हृदय द्रवित हो जाता है और वे सहायता करते हैं। कथा का केंद्रीय संदेश है कि माता सभी संतानों से प्रेम करती है, लेकिन असहाय और दुर्बल संतान को विशेष संरक्षण और सहानुभूति की आवश्यकता होती है। यह पाठ सभी प्राणियों के प्रति करुणा और समदृष्टि का भाव भी विकसित करता है।